Brahmachari Dr. Girish Chandra Varma Ji Blog


भीतरी परिवर्तन

भीतरी परिवर्तन

भीतरी परिवर्तन  13/04/2026 11:57:02 AM   भीतरी परिवर्तन   Administrator

एक सुंदर जापानी कहानी है। एक आदमी चट्टानों को तराशने का कार्य करता था। वह कड़ा परिश्रम करता, किंतु कमाई कुछ विशेष नहीं होती। वह असंतुष्ट रहता था। वह आहें भरा करता। एक बार वह चिल्लाकर बोला, 'काश! मैं इतना धनवान होता कि रेशमी गद्दों पर आराम करता।' स्वर्ग से एक देवदूत आया और बोला, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' वह आदमी धनवान हो गया, उसने रेशम के गद्दे पर स्वयं को बैठा हुआ पाया। तभी वहाँ से उस देश का राजा निकला। उसके रथ के आगे और पीछे घुड़सवार चल रहे थे और सिर के ऊपर सोने का छत्र लगा हुआ था। जब उस धनवान ने यह दृश्य देखा, तो वह अपनी स्थिति से असंतुष्ट हो गया। आहें भरते हुए चिल्लाया, 'मैं राजा बनना चाहता हूँ।' देवदूत फिर आया और बोला, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' अचानक उस धनवान ने स्वयं को रथ पर पाया। उसके आगे घुड़सवार चल रहे थे, पीछे घुड़सवार चल रहे थे और ऊपर छत्र लगा हुआ था। उस दिन सूरज तमतमाता हुआ धरती को ऐसे झुलसा रहा था कि जैसे सब कुछ स्वाहा हो जाएगा। राजा को शिकायत हुई कि सूरज की शक्ति उससे अधिक है। वह असंतुष्ट हो गया। वह चिल्लाया, 'मैं सूरज होना चाहता हूँ।' देवदूत आया और कहा, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' राजा सूरज बन गया। उसने धरती की सारी खर-पतवार जला दी और पृथ्वी के समस्त राजाओं के काफिलों को झुलसा दिया। फिर एक बादल आया और उसके व पृथ्वी के बीच अड़ गया। इस प्रकार वह बादल बन गया। बादल ने धरती पर मोटी-मोटी बूँदें बरसार्इं, जिनसे नदियों में बाढ़ आ गई, घर बह गए, खेत नष्ट हो गए। उसकी बूँदें एक चट्टान पर गिरीं, जो टस से मस न हुई। बादल क्रोधित हो गया, क्योंकि चट्टान उसकी शक्ति के सामने झुक नहीं रही थी। वह चिल्लाया, 'मैं चट्टान होना चाहता हूँ।' देवदूत ने चट्टान बना दिया। तभी एक आदमी छैनी व हथौड़ी लिए हुए आया और चट्टान को तराशने लगा। चट्टान ने सोचा कि इस आदमी के पास इतनी शक्ति कैसे है, जो मेरी छाती से पत्थर तराश रहा और वह असंतुष्ट हो गया। वह चिल्लाया, 'मैं कमजोर हूँ। मैं आदमी बनना चाहता हूँ।' देवदूत ने फिर से उसे संगतराश बना दिया। अब भी वह कड़ा परिश्रम करता और थोड़ी सी कमाई होती, मगर उसी में संतुष्ट था। संतोष का अर्थ उस सबके प्रति बोध से भरना है, जो तुम्हारे पास है। यदि तुम्हें एक झलक भी मिल जाए कि कितना कुछ तुम्हें मिला हुआ है, तो क्या तुम्हारी अपेक्षा रह जाएगी? अधिक की अपेक्षा करना मात्र अनुग्रह की कमी है। यदि तुम पूरे परिप्रेक्ष्य को देख पाओ, तो जो तुम्हें मिला है, उसके प्रति अहोभाव से भर जाओगे। जब हम चर्चा करते हैं कि परिवर्तन कैसे लाया जाए, तो उस परिवर्तन से हमारा तात्पर्य सामान्यत: सतही परिवर्तन से होता है। दृढ़ निश्चय, निष्कर्ष, विश्वास, नियंत्रण और झिझक के द्वारा हम उस सतही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संघर्ष करते हैं, जिसे चाहते हैं; जिसके लिए हम लालायित हैं। हम यह उम्मीद लगाते हैं कि उस तक पहुँचने में अचेतन मन, हमारे मन के गहरे स्तर तक हमारी सहायता करेंगे। हमें लगता है कि यह आवश्यक है कि हम उन गहरे स्तरों को अनावृत्त करें, परंतु सतही स्तरों और तथाकथित गहरे स्तरों के बीच एक शाश्वत द्वंद्व है। मनोवैज्ञानिक इससे भली-भाँति परिचित हैं। क्या यह परिवर्तन लाएगा? क्या यह हमारे दैनिक जीवन का सर्वाधिक मूलभूत और महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है कि कैसे अपने आप में एक आमूल परिवर्तन लाया जाए? क्या सतही स्तर पर कुछ बदलाव वह परिवर्तन ला सकेंगे? क्या चेतना के 'मैं' के विभिन्न स्तरों को समझना; अतीत अर्थात् बचपन से आज तक के विभिन्न व्यक्तिगत अनुभवों को अनावृत्त करना; अपने माता-पिता, पूर्वजों व प्रजाति के सामूहिक अनुभवों का स्वयं में निरीक्षण करना; उस समाज विशेष की संस्कारबद्धता का अनुसंधान करना, जिसमें हम रहते हैं, क्या यह सब विश्लेषण ऐसा परिवर्तन ला पाएगा, जो छिटपुट सामंजस्य बिठाना भर न हो? मैं यह महसूस करता हूँ और निस्संदेह आपको भी यह महसूस होता होगा कि व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आवश्यक है। एक ऐसा परिवर्तन, जो प्रतिक्रिया मात्र नहीं है, जो परिवेश की माँगों के दबाव और तनाव का परिणाम नहीं है। ऐसा परिवर्तन कैसे लाया जाए? चेतना मानव जाति के अनुभव का योग तो है ही, उसमें वर्तमान से अपना विशिष्ट संपर्क भी जुड़ा है; क्या वह चेतना परिवर्तन ला सकती है? क्या अपनी चेतना व गतिविधियों का मेरा अध्ययन मन को यूँ स्थिर कर सकता है, जिससे वह बिना निंदा के निरीक्षण कर सके? परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान का प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट नियमित अभ्यास से स्वयं में स्थित होकर जब हम स्वयं का अवलोकन करते हैं तो हम पाते हैं कि प्रत्येक परिवर्तन जब प्रकृति के नियमों के अनुकूल होता है तो वह हमें भीतर एवं बाहर से जोड़ता है एक अनुकूलनशीलता का अनुभव होता है जो हमें परिवर्तनों के प्रति सकारात्मक दृष्टि देता है तो हमें उत्तरोत्तर प्रसन्नता का अनुभव होता है क्योंकि जीवन संघर्ष नहीं आनंद है।


0 Comments

Leave a Comment